जहाँ 21 सिख भिड़ गए दस हज़ार पठानों से

12 सितंबर, 1897 को सुबह 8 बजे सारागढ़ी किले के संतरी ने दौड़कर अंदर ख़बर दी कि हज़ारों पठानों का एक लश्कर झंडों और नेज़ो (निशान) के साथ उत्तर की तरफ़ से सारागढ़ी क़िले की तरफ़ बढ़ रहा है.

उनकी तादाद 8,000 से 14,000 के बीच थी. संतरी को फ़ौरन अंदर बुला लिया गया और सैनिकों के नेता हवलदार ईशेर सिंह ने सिग्नल मैन गुरमुख सिंह को आदेश दिया कि पास के फ़ोर्ट लॉकहार्ट में तैनात अंग्रेज़ अफ़सरों को तुरंत हालात से अवगत कराया जाए और उनसे पूछा जाए कि उनके लिए क्या हुक्म है?

कर्नल हॉटन ने हुक्म दिया, "होल्ड यॉर पोज़ीशन." यानी अपनी जगह पर डटे रहो. एक घंटे के अंदर क़िले को तीन तरफ़ से घेर लिया गया और ओरकज़ईयों का एक सैनिक हाथ में सफ़ेद झंडा लिए क़िले की तरफ़ बढ़ा.

उसने चिल्ला कर कहा, "हमारा तुमसे कोई झगड़ा नहीं है. हमारी लड़ाई अंग्रज़ों से है. तुम तादाद में बहुत कम हो, मारे जाओगे. हमारे सामने हथियार डाल दो. हम तुम्हारा ख्याल रखेंगे और तुमको यहाँ से सुरक्षित निकल जाने का रास्ता देंगे."

बाद में ब्रिटिश फ़ौज के मेजर जनरल जेम्स लंट ने इस लड़ाई का वर्णन करते हुए लिखा, "ईशेर सिंह ने इस पेशकश का जवाब ओरकज़ईयों की ही भाषा पश्तो में दिया. उनकी भाषा न सिर्फ़ सख़्त थी बल्कि गालियों से भी भरी हुई थी. उन्होंने कहा कि ये अंग्रेज़ों की नहीं महाराजा रणजीत सिंह की ज़मीन है और हम इसकी आख़िरी सांस तक रक्षा करेंगे."

क्यों हुई थी सारागढ़ी की लड़ाई
सारागढ़ी का क़िला पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत क्षेत्र के कोहाट ज़िले में करीब 6000 फ़ीट की ऊँचाई पर है.

ये वो इलाका है जहाँ रहने वाले लोगों पर आज तक किसी सरकार का नियंत्रण नहीं हो पाया है.

1880 के दशक में अंग्रेज़ों ने यहाँ पर तीन चौकियाँ बनाईं जिसका स्थानीय औरकज़ई लोगों ने ज़बरदस्त विरोध किया, जिसकी वजह से अंग्रेज़ों को वो चौकियाँ खाली करनी पड़ी.

1891 में अंग्रेज़ों ने वहाँ दोबारा अभियान चलाया. रबिया खेल से उनका समझौता हुआ और उन्हें गुलिस्ताँ, लॉक्हार्ट और सारागढ़ी में तीन छोटे क़िले बनाने की अनुमति मिल गई.

लेकिन स्थानीय औरकज़ई लोगों ने इसे कभी पसंद नहीं किया. वो इन ठिकानों पर लगातार हमले करते रहे ताकि अंग्रेज़ वहाँ से भाग खड़े हों.

3 सितंबर 1897 को पठानों के बड़े लश्कर ने इन तीनों क़िलों को घेरने की कोशिश की लेकिन कर्नल हॉटन ने किसी तरह हालात को संभाल लिया.

लेकिन 12 सितंबर को औरकज़ईयों ने गुलिस्ताँ, लॉकहार्ट और सारागढ़ी तीनों क़िलों को घेर लिया और लॉक्हार्ट और गुलिस्ताँ को सारागढ़ी से अलग-थलग कर दिया.

सारागढ़ी लड़ाई पर बहुचर्चित किताब 'द आइकॉनिक बैटिल ऑफ़ सारागढ़ी' लिखने वाले ब्रिगेडियर कंवलजीत सिंह बताते हैं, "हवलदार ईशेर सिंह ने अपने जवानों को आदेश दिया कि गोली न चलाई जाए और पठानों को आगे आने दिया जाए और उन पर तभी फ़ायरिंग की जाए जब वो 1000 गज़ यानी उनकी 'फ़ायरिंग रेंज' में आ जाएं."

"सिख जवानों के पास सिंगल शॉट 'मार्टिनी हेनरी .303' राइफ़लें थीं जो 1 मिनट में 10 राउंड फ़ायर कर सकती थीं. हर सैनिक के पास 400 गोलियाँ थी, 100 उनकी जेबों में और 300 रिज़र्व में. उन्होंने पठानों को अपनी राइफ़िलों की रेंज में आने दिया और फिर उन्हें चुन-चुन कर निशाना बनाना शुरू कर दिया."

पहले एक घंटे में ही पठानों के 60 सैनिक मारे जा चुके थे और सिखों की तरफ़ से सिपाही भगवान सिंह की मौत हो चुकी थी और नायक लाल सिंह बुरी तरह से घायल हो चुके थे.

पठानों का पहला हमला नाकामयाब हो गया. वो बिना किसी मक़सद के इधर-उधर दौड़ने लगे लेकिन उन्होंने सिखों पर गोली चलानी बंद नहीं की.

सिख भी उनका मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे लेकिन हज़ारों फ़ायर करते हुए पठानों के सामने 21 राइफ़लों की क्या बिसात थी? और फिर कितने समय तक?

तभी उत्तर की तरफ़ से चलने वाली तेज़ हवा से पठानों को बहुत मदद मिल गई. उन्होंने घास में आग लगा दी और उनकी लपटें क़िले की दीवारों की तरफ़ बढ़ने लगीं.

धुएं का सहारा लेते हुए पठान क़िले की दीवार के बिल्कुल पास चले आए. लेकिन सिखों का निशाना ले कर की जा रही सटीक फ़ायरिंग की वजह से उन्हें पीछे हटना पड़ा.

उस बीच सिख ख़ेमे में भी घायलों की संख्या बढ़ती जा रही थी. सिपाही बूटा सिंह और सुंदर सिंह वीर गति को प्राप्त हो चुके थे.

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