चीन को उसी की रणनीति से घेर सकता है भारत: नज़रिया
ज़्यादातर और यहां तक कि ताकतवर देशों का भी सोचना है कि चीन की उस मंशा पर लगाम कसने की आवश्यकता है, जिसमें चीन स्वयं को अमरीका की जगह दुनिया के सबसे ताकतवर देश के रूप में स्थापित करना चाहता है.
अमरीकी विदेश विभाग के नीति निर्धारण विभाग के पूर्व प्रमुख रिचर्ड हास ने लिखा है कि ऐसा संबंधों के "प्रबंधन" के ज़रिए हो सकता है.
भारत सरकार के लिए ये कोई नई बात नहीं है जो साल 1962 में हिमालय में हुए युद्ध में करारी शिकस्त झेलने के बाद से अपने पड़ोसी देश के साथ संबंधों का प्रबंधन कर रहा है.
इस युद्ध के बाद दिल्ली ने "हिन्दी-चीनी भाई भाई" नारे को तिलांजलि दे दी थी. आज़ादी के बाद ये वो राग था, जिसे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एशियाई मामलों को प्रोत्साहन देने के लिए भारत-चीन के मधुर संबंधों के रूप में अलापते रहे थे.
लेकिन समय बीतने के साथ संबंधों का प्रबंधन कष्टदायक होता जा रहा है क्योंकि चीन ने रणनीतिक रूप से अपनी योजनाओं को मज़बूत किया है. वो अपनी नीतियों और क्रियाकलापों में लचीलापन रखता है.
उसके पास दोस्त बनाने और लक्षित देशों को प्रभावित करने के लिए भारी संसाधन भी हैं. इनके दम पर वो लगातार आगे बढ़ रहा है.
क्या है चीन की रणनीति
हिन्द महासागर क्षेत्र तथा एशिया के तटीय देशों का समूह लगातार चीन की ताकत को बढ़ने से रोकने की कोशिश कर रहा है. इनमें जो कमज़ोर देश हैं, उनके लिए चीन की मदद और उससे आसान शर्तों पर मिलने वाले क़र्ज के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण की लुभावनी पेशकश से बच पाना मुश्किल है.
ये उच्च स्तरीय "कर्ज़ आधारित कूटनीति" है और इस मामले में हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में कोई भी देश चीन की बराबरी नहीं कर सकता. यहां तक कि जापान और भारत भी नहीं.
एक रास्ता तो श्रीलंका ने श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लेकर तलाश किया है. उच्च लागत वाली परियोजना के कारण पैदा होने वाली परेशानियां दूर करने के लिए उसने कर्ज़ चुकाया और चीन की कम्पनी के साथ 99 वर्षों का पट्टा समाप्त कर दिया.
ये सबक महत्त्वपूर्ण है और इसे जल्द अपनाया भी गया. इसका अनुसरण करते हुए म्यांमार, मलेशिया और थाईलैंड ने चीन के कर्ज़ से चलनेवाली परियोजनाएं या तो समाप्त कर दी हैं या फिर कम कर दी हैं. यहां तक कि पाकिस्तान में, जो संभावित चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर को अपने लिए महत्वपूर्ण मान रहा था, ज़्यादा से ज़्यादा लोग उस कर्ज़ को सशंकित रूप से देख रहे हैं, जिसमें उनका देश फंस सकता है.
अपना प्रभुत्व जमाने के लिए चीन आर्थिक के अलावा सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति पर भी ध्यान देता है जिसे चीन के रणनीतिकार "मलक्का डिलेमा" कहते हैं.
हिन्द महासागर के रास्ते होने वाले उसके 80% व्यापार की सुरक्षा आवश्यक है. यह रास्ता मलक्का, लम्बोक और सुन्डा जलडमरूमध्यों के "चेकप्वाइंट्स" से होकर जाता है. इसे देश के पूर्वी तटों पर और अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में स्थित भारतीय नौसेना का एकीकृत कमांड प्रभावशाली तरीके से नियंत्रित करता है.
अमरीकी विदेश विभाग के नीति निर्धारण विभाग के पूर्व प्रमुख रिचर्ड हास ने लिखा है कि ऐसा संबंधों के "प्रबंधन" के ज़रिए हो सकता है.
भारत सरकार के लिए ये कोई नई बात नहीं है जो साल 1962 में हिमालय में हुए युद्ध में करारी शिकस्त झेलने के बाद से अपने पड़ोसी देश के साथ संबंधों का प्रबंधन कर रहा है.
इस युद्ध के बाद दिल्ली ने "हिन्दी-चीनी भाई भाई" नारे को तिलांजलि दे दी थी. आज़ादी के बाद ये वो राग था, जिसे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एशियाई मामलों को प्रोत्साहन देने के लिए भारत-चीन के मधुर संबंधों के रूप में अलापते रहे थे.
लेकिन समय बीतने के साथ संबंधों का प्रबंधन कष्टदायक होता जा रहा है क्योंकि चीन ने रणनीतिक रूप से अपनी योजनाओं को मज़बूत किया है. वो अपनी नीतियों और क्रियाकलापों में लचीलापन रखता है.
उसके पास दोस्त बनाने और लक्षित देशों को प्रभावित करने के लिए भारी संसाधन भी हैं. इनके दम पर वो लगातार आगे बढ़ रहा है.
क्या है चीन की रणनीति
हिन्द महासागर क्षेत्र तथा एशिया के तटीय देशों का समूह लगातार चीन की ताकत को बढ़ने से रोकने की कोशिश कर रहा है. इनमें जो कमज़ोर देश हैं, उनके लिए चीन की मदद और उससे आसान शर्तों पर मिलने वाले क़र्ज के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण की लुभावनी पेशकश से बच पाना मुश्किल है.
ये उच्च स्तरीय "कर्ज़ आधारित कूटनीति" है और इस मामले में हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में कोई भी देश चीन की बराबरी नहीं कर सकता. यहां तक कि जापान और भारत भी नहीं.
एक रास्ता तो श्रीलंका ने श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लेकर तलाश किया है. उच्च लागत वाली परियोजना के कारण पैदा होने वाली परेशानियां दूर करने के लिए उसने कर्ज़ चुकाया और चीन की कम्पनी के साथ 99 वर्षों का पट्टा समाप्त कर दिया.
ये सबक महत्त्वपूर्ण है और इसे जल्द अपनाया भी गया. इसका अनुसरण करते हुए म्यांमार, मलेशिया और थाईलैंड ने चीन के कर्ज़ से चलनेवाली परियोजनाएं या तो समाप्त कर दी हैं या फिर कम कर दी हैं. यहां तक कि पाकिस्तान में, जो संभावित चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर को अपने लिए महत्वपूर्ण मान रहा था, ज़्यादा से ज़्यादा लोग उस कर्ज़ को सशंकित रूप से देख रहे हैं, जिसमें उनका देश फंस सकता है.
अपना प्रभुत्व जमाने के लिए चीन आर्थिक के अलावा सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति पर भी ध्यान देता है जिसे चीन के रणनीतिकार "मलक्का डिलेमा" कहते हैं.
हिन्द महासागर के रास्ते होने वाले उसके 80% व्यापार की सुरक्षा आवश्यक है. यह रास्ता मलक्का, लम्बोक और सुन्डा जलडमरूमध्यों के "चेकप्वाइंट्स" से होकर जाता है. इसे देश के पूर्वी तटों पर और अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में स्थित भारतीय नौसेना का एकीकृत कमांड प्रभावशाली तरीके से नियंत्रित करता है.
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